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विद्वत् परिषद् क्यों?


जब सत्ता पक्ष किंकर्तव्यविमूढ़ होकर थक जाता है; मदोन्मत्त होकर निरंकुश हो जाता है, जब शासन दिङ्मूढ़ और विजड़ित होकर आत्महित में लग जाता है तब संतवर्ग और विद्वज्जन आकाशदीप बनकर जलते हैं, अक्षय प्रकाश वितरित करते हैं।

ज्ञान कभी उपेक्षणीय नहीं होता। विद्या, तप और सदाचार राष्ट्रजीवन की धड़कने हैं। इनका संचयन राष्ट्र को दीर्घजीवन, स्वास्थ्य और गति देता है। इस गति को सही दिशा विद्वत् परिषद् देती है।

विद्वत् संसद (Parliament of Scholars) एक सेतु है जो लोक संसद और धर्म संसद को जोड़ती है।

धर्म संसद से हीन राष्ट्र विनष्ट हो जाता है।
विद्वत् संसद से हीन राष्ट्र तिरस्कृत हो जाता है।
लोक संसद से हीन राष्ट्र विखण्डित हो जाता है।