डॉ. कामेश्वर उपाध्याय
महासचिव

अनेक जिज्ञासुओं, मित्रों एवं शिष्यों ने मुझसे पूछा- राष्ट्र संवर्धन के लिए यज्ञ क्यों? अमेरीका तथा यूरोप के लोग राष्ट्र संवर्धन के लिए यज्ञ नहीं करते फिर भी उनका देश संवर्धित है। ऐसा क्यों?

यह एक सहज परिप्रश्न है। परिप्रश्न होने से भी राष्ट्र संवर्धन होता है। ऐसे प्रश्नों के उत्तर भी अनेक रहस्यों के उद्घाटक होते हैं। ये प्रश्न पहले भी पूछे जाते थे, आज भी पूछे जाते हैं और आगे भी पूछे जायेंगे। अत: यह परिप्रश्न है। इस पर विचार करते हैं-

  • क्या समुद्र में उठने वाले तूफान, चक्रवात, वेला (तट) अतिक्रमण  को कोई राष्ट्राध्यक्ष या उसका प्रशासन रोक सकता है?
  • क्या समुद्र के पैâलाव से उत्पन्न विनाश और समुद्र के संकोच से उत्पन्न द्वीप निर्माण को कोई राष्ट्राध्यक्ष या उसका प्रशासन रोक सकता है?
  • क्या भूकम्प द्वारा उत्पन्न महाविनाश को कोई राष्ट्राध्यक्ष या उसका प्रशासन रोक सकता है?
  • क्या भूस्खलन और बाँधों के टूटने से उत्पन्न महाविनाश को कोई राष्ट्राध्यक्ष या उसका प्रशासन रोक सकता है?
  • क्या आकाशीय विद्युत् को भूमि पर गिरने से कोई राष्ट्राध्यक्ष या उसका प्रशासन रोक सकता है?
  • क्या अतिवृष्टि या अनावृष्टि को कोई राष्ट्राध्यक्ष या उसका प्रशासन रोक सकता है?
  • क्या अग्निदाह, शस्त्राग्निविस्फोट, हवाईजहाज का पतन, रेलगाड़ी या सड़कयान की दुर्घटना से प्रजाक्षय को कोई राष्ट्राध्यक्ष या उसका प्रशासन रोक सकता है?

इन सभी प्रश्नों का उत्तर है- नहीं। प्राकृतिक आपदाओं को मानवीय संसाधनों के माध्यम से रोका नहीं जा सकता। प्राकृतिक आपदा का शमन दैवी आराधना से ही संभव है। जहाँ मानव प्रयत्न असहाय हो जाता है, वहीं से दैवीय परिणाम उत्पन्न होने लगते हैं।

भारतवर्ष को समुद्रमग्न होने से बचाने के लिए ऋषियों के द्वारा श्रीरामेश्वरम्, श्रीसोमनाथ, श्रीशूलटंकेश्वर आदि शिवलिंगों की स्थापना की गयी। ११ मार्च २०११ को आयी सुनामी ने जापान को तबाह कर दिया। इस प्राकृतिक विपत्ति ने जापान में जीवन संकट को खड़ा कर दिया। इस प्रकार की दिव्य-अन्तरिक्ष-भूमिज-समुद्रज-अग्निज विपत्तियों से जीवन और धन की रक्षा यज्ञों के माध्यम से होती है। इस संदर्भ में महर्षियों ने विस्तारपूर्वक चर्चा की है। जब कभी प्रशासन के स्तर पर राष्ट्र को दैवीय विपत्ति से बचाने का प्रयत्न नही ंहोता है, तब ऋषि समुदाय स्वयं के स्तर पर जनहित में ऐसी विपत्तियों का निराकरण करता है। अनेक दिव्य प्रयोगों का यहाँ उल्लेख किया जा रहा है, जिनसे दैवी विपत्तियों का निराकरण होता है-

  1. महाशांति प्रयोग (दिव्य अन्तरिक्ष और भूमिज शांति)
  2. वैश्वदेवी शांति (सामूहिक मृत्युनिवारण प्रयोग)
  3. आग्नेयी शांति (भयानक अग्निदाह निवारण प्रयोग)
  4. भार्गवीशांति (रोग से सामूहिक मृत्युनिवारण प्रयोग)
  5. बार्हस्पत्य शांति (राष्ट्र लक्ष्मी और राष्ट्र वर्चस्व हेतु प्रयोग)
  6. प्राजापत्य शांति (प्रजाक्षय निवारण प्रयोग)
  7. आंगिरस शांति (राष्ट्र के शत्रुओं को उखाड़ने हेतु प्रयोग)
  8. गायत्री-सावित्री शांति (राष्ट्रतेज एवं प्रातिभतेज हेतु प्रयोग)
  9. ऐन्द्री शांति (राष्ट्र विजय हेतु प्रयोग)
  10. माहेन्द्री शांति (राज्य विस्तार हेतु प्रयोग)
  11. कौबेरी शांति (राष्ट्रकोष एवं राष्ट्रधन की रक्षा हेतु प्रयोग)
  12. आदित्या शांति (विद्या, तेज, धन, आयुवृद्धि हेतु प्रयोग)
  13. वैष्णवी शांति (अन्न की विपुलता हेतु प्रयोग)
  14. रौद्री शांति (उग्र उपद्रवों से राष्ट्र रक्षार्थ शांति)
  15. अपराजिता शांति (राष्ट्र विजय हेतु प्रयोग)
  16. याम्या शांति (मृत्युभय निवारणार्थ प्रयोग)
  17. वारुणी शांति (जल भय से राष्ट्रक्षय रोकने हेतु प्रयोग)
  18. वायव्या शांति (तेज गति वायुभय से राष्ट्ररक्षार्थ प्रयोग)
  19. त्वाष्ट्री शांति (राष्ट्र में शिल्पवृद्धि हेतु प्रयोग)
  20. कौमारी शांति (बालभय निवारणार्थ प्रयोग)
  21. नैर्ऋती शांति (राष्ट्र एवं राजा की दुर्गति रोकने हेतु शांति)
  22. मारुद्गणी शांति (राष्ट्र ओज-बल वृद्धि हेतु प्रयोग)
  23. गांधर्वी शांति (घोड़ों की वृद्धि हेतु प्रयोग)
  24. पारावती शांति (हाथीयों की वृद्धि हेतु प्रयोग)
  25. पाथर्वी शांति (राष्ट्रभूमि रक्षा हेतु प्रयोग)
  26. अभया शांति (राष्ट्रभय निवारणार्थ प्रयोग)

इस प्रकार के अनेक दिव्य प्रयोग राजा, प्रजा एवं राष्ट्र की रक्षा के लिए शास्त्रों में वर्णित हैं। यज्ञ के माध्यम से इन प्रयोगों का संधान किया जाता है। आज देश में गाय, बैल, हाथी, घोड़ा, ऊँट, खच्चर आदि की कमी होती चली जा रही है। पृथ्वी पर मनुष्य से २० गुणित अधिक पशुधन होना चाहिए। ऐसा शास्त्रों में वर्णित है। सभी प्रकार के पशुधन की रक्षा के लिए राष्ट्राध्यक्ष को निरन्तर प्रयत्नशील रहना चाहिए। उपर्युक्त कारणों से ऋषियों ने राष्ट्र संवर्धन के लिए यज्ञ को एक महत्त्वपूर्ण संसाधन माना है। नास्तिक्य बुद्धि एवं अदृश्य शक्ति पर विश्वास न होने के कारण मानव मन इन विषयों पर सहज अविश्वास प्रकट करता है। इन उपायों को करने वाला मनुष्य हमेशा आश्वस्त रहता है। जिस प्रकार से बीमार व्यक्ति की रक्षा भैषज्य, मंत्र एवं मणि आदि से की जाती है, उसी प्रकार से राष्ट्र रक्षा हेतु सभी प्रकार के प्रयत्नों को करना चाहिए।

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