महासचिव का सन्देश

डॉ. कामेश्वर उपाध्याय

pnaditjiभारतवर्ष विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्रात्मक प्राचीन राष्ट्र है। इस देश में श्रेष्ठ विद्वानों, चिन्तकों, विचारकों की संख्या दस करोड़ से भी अधिक है। इसके बाद भी आज यह देश वैचारिक रूप से विघटित एवं संदेहग्रस्त है। अतः विद्वत्जनों को सभी प्रकार के आग्रहों से ऊपर उठकर राष्ट्र और जन के कल्याण हेतु एक दिशा में प्रयत्न करना चाहिए। किसी भी विषय पर एक मत को निर्धारित करने में वैज्ञानिक प्रक्रिया ही आधार बनती है। अतः सार्वभौमिक, प्रकृति नियंत्रित, राष्ट्र कल्याणकारी तथा सर्वतोमुख, सर्वग्राह्य नीति पर विचार करना विद्वत् समाज का महान् कर्तव्य है। इस कर्तव्य के पालन में यदि अपने स्वार्थ का त्याग भी करना पड़े तो इस पवित्र कार्य को करना चाहिए। ज्ञान के सदृश त्रैलोक्य में कुछ भी पवित्र नहीं है- न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते। ज्ञान न केवल पवित्र है अपितु यह प्रकाशमय और सर्वकल्याणकारी है। अतः हमें दृढ़ता के साथ राष्ट्र हित में शांत एवं सुव्यवस्थित मन से निर्णय लेना होगा। राजनीति के माध्यम से सर्वकल्याणकारी नीतियाँ आज नहीं बनायी जा रही हैं। अपने प्रभुत्व एवं राजसत्ता के अनुकूल सिद्धान्तों का गठन किया जा रहा है। विदेशी नीतियों को बाह्य दबाव में राष्ट्र एवं जनविरोधी होने पर भी देश की जनता के ऊपर लादा जा रहा है।

उदाहरण के तौर पर जीवनदायिनी नदियों को समुद्र तक जाने से रोक दिया गया है। हिमालय को ढहाया जा रहा है। यदि राजसत्ता एक पर्वत और एक नदी नहीं बना सकती तो उसे इन प्राकृतिक संसाधनों को नष्ट करने का अधिकार नहीं है। यह एक उदाहरण मात्र है। ऐसे में विद्वानों का कर्तव्य बनता है कि राष्ट्रहित में अपनी बात स्पष्ट रखें। राजसत्ता स्वीकार करे या न करे पर बौद्धिक सत्ता को अपनी बात प्रामाणिकता के साथ रखनी चाहिए। अनन्त कालप्रवाह में सत्य जब प्रामाणित होकर उभरता है तब उसकी स्वीकार्यता बढ़ जाती है।

यह शाश्वत है कि सत्य हमेशा चमकता रहता है-

यत् सत्यं तद् विभाव्यते।

वेदों में सूर्य को सत्य कहा गया है। सूर्य की चमक में सत्य चमकता है। सत्य ही पृथ्वी को धारण करता है। अतः देश के विद्वद्जनों से आग्रह है कि वे एकाग्र चित्त हो राष्ट्र कल्याण हेेतु चिंतन करें। स्वयं जाग्रत रहें तथा सोये हुए लोगों को जगाने का काम करें। भारत की पृष्ठभूमि ऋषियों के ज्ञान से निर्मित है। केवल विदेशी ज्ञान को प्रमाण मानकर भारतीय ज्ञान-विज्ञान को निर्वासित न करें। अखिल भारतीय विद्वत् परिषद् राष्ट्र के कण-कण और जन-जन के उत्कर्ष के लिए अपना सर्वस्व और सर्वश्रेष्ठ उपलब्ध कराने के लिए प्रतिबद्ध है।