इस वर्ष आषाढ़ अधिक मास है। यह १७ जून से लेकर १६ जुलाई तक है। लोक में अधिकमास को पुरुषोत्तम मास अथवा मलमास कहते हैं। अधिकमास में विवाह, मुण्डन, यज्ञोपवीत, गृहारम्भ, गृहप्रवेश, वेदव्रत, वृषोत्सर्ग, वधूप्रवेश, दीक्षा, उद्यापन, महादान, मंदिरनिर्माण, यज्ञकर्म नहीं किया जाता है। अधिक मास में तीर्थश्राद्ध, वार्षिकश्राद्ध, शिवविष्णुकीपूजा करने का विशेष महत्त्व है। अधिक मास में भगवान् विष्णु की विशेष पूजा की जाती है। इसमें भगवान् विष्णु के ३३ नामों से मालपूआ भोग लगाया जाता है। इसे दान करने का अपूर्व महत्त्व है। कांस्यपात्र में गोघृत एवं स्वर्ण के साथ ब्राह्मण को दान किया जाता है। ये ३३ नाम निम्नलिखित हैं- १. विष्णु २. जिष्णु ३. महाविष्णु ४. हरि ५. कृष्ण ६. अधोक्षज ७. केशव ८. माधव ९. राम १०. अच्युत ११. पुरुषोत्तम १२. गोविन्द १३. वामन १४. श्रीश १५. श्रीकान्त १६. विश्वसाक्षी १७. नारायण १८. मधुरिपु १९. अनिरूद्ध २०. त्रिविक्रम २१. वासुदेव २२. जगद्योनि २३. अनन्त २४. शेषशायी २५. संकर्षण २६. प्रद्युम्न २७. दैत्यारी २८. विश्वतोमुख २९. जनार्दन ३०. धरावास ३१. दामोदर ३२. अघार्दन (पापनाशक) ३३. श्रीपति।

आषाढ़ मास में एकभक्तव्रत करने से धन-धान्य और पुत्र की प्राप्ति होती है। यह भगवान् वामन का मास है। अत: उनकी प्रसन्नता के लिए जुता, छाता, नमक और आँवला का दान करना चाहिए। आषाण शुक्ल एकादशी के दिन श्रीहरि का शयन महोत्सव होता है। शय्या सजाकर शंख, चक्र, गदा, पद्म तथा लक्ष्मी एवं विष्णु की प्रतिमा को रखकर उनकी पूजा की जाती है। आषाण शुक्ल एकादशी या द्वादशी के दिन चातुर्मास्यव्रत का संकल्प किया जाता है। प्रथम चातुर्मास्य व्रत को अधिक आषाढ़ अथवा गुरु-शुक्र के अस्त होने पर नहीं करना चाहिए। यह व्रत शैव और वैष्णव दोनों करते हैं। भगवान् विष्णु को जूही का पूâल अत्यन्त प्रिय है। अत: उन्हें अर्पित करना चाहिए। चातुर्मास्य व्रत करने वालों को लाल रंग का अन्न एवं शाक का त्याग कर देना चाहिए। चातुर्मास्य में निम्नलिखित का त्याग करना शुभकारी होता है-
१.    गुड़ का त्याग करने से मधुर स्वर की प्राप्ति होती है।
२.    तेल का त्याग करने से अंग सुन्दर होते हैं।
३.    ताम्बूल का त्याग करने से मधुर वंâठ एवं संसाधन की प्राप्ति होती है।
४.    घृत त्याग करने से शरीर कोमल होता है।
५.    शाक का त्याग करने से भोज्यपदार्थ की प्राप्ति होती है।
६.    उबटन का त्याग करने से सुन्दर शरीर की प्राप्ति होती है।
७.    बटुली में पकाये अन्न के त्याग से संतान की वृद्धि होती है।
८.    जमीन पर कुशा बिछा कर सोने से श्रीविष्णु की कृपा होती है।
९.    मधु और मांस का त्याग करने से मुनित्व की प्राप्ति होती है।
१०.  योगाभ्यास करने से ब्रह्मपद मिलता है।

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