वृष्टि परीक्षण
१४ जून से लेकर १२ जुलाई तक आषाढ़ मास है। यह मास वर्षा ऋतु का प्रथम मास है। यदि इस मास में मानसूनी वृष्टि न हो, तो सूखा पड़ने का खतरा उत्पन्न हो जाता है। आचार्यों ने इस मास में पाँच प्रकार से वृष्टि परीक्षण करके सुनिश्चित किया कि कितनी वृष्टि होगी? एक सिद्धान्त है यदि आषाढ़ मास के प्रथम दिन पाँच निमित्तों में से कोई एक भी निमित्त हो तो दो माह आगे तक वर्षा होती है। ये निमित्त निम्नलिखित हैं- (१) आकाश में बादल न हों (२) बिजली न चमके (३) गर्जना न हो (४) बूँदा-बाँदी न हो (५) शीतल हवा न बहे तो आषाढ़ और श्रावण मास में वर्षा नहीं होती है। इन परीक्षणों का दायरा प्रायश: दस कोस (३० किलोमीटर) तक माना गया है। अत: प्राचीन काल के ज्योतिषी (वर्षा परीक्षक) अपने-अपने क्षेत्र में वृष्टि का परीक्षण करते थे।
इस वर्ष आषाढ़ मास में बुध और शुक्र की युति १६ जून से हो रही है। अत: वर्षा का योग १८, १९, २० जून को दूर-दूर तक पृथ्वी को आप्लावित करने वाला बन रहा है।
भारत वर्ष के उन मेधावी वृष्टि परीक्षकों से विनम्र निवेदन है कि वे अपने-अपने क्षेत्र में वृष्टि का परीक्षण कर भविष्यफल का कथन करें। यदि ५० से ६० प्रतिशत वृष्टि का फलादेश सही होता है तो यह एक बड़ी सफलता होगी।
शास्त्रीय परीक्षण के अनुसार १८, १९, २० जून को अच्छी वृष्टि का योग है। इसके आगे २७ से ३० जून के भीतर उत्तम वृष्टि का योग बन रहा है। इस कालखण्ड में दूर-दूर तक उत्तम वृष्टि होगी।

योगिनी एकादशी

आषाढ़ मास के कृष्णपक्ष की एकादशी को योगिनी एकादशी कहते हैं। इस व्रत को करने से कुष्ठरोग एवं  चर्मरोग से बचाव होता है।

हरिशयनी एकादशी

८ जुलाई मंगलवार को हरिशयनी एकादशी पड़ रही है। आज से ही भगवान् विष्णु शयन करते हैं, जिसे चातुर्मास्य कहा जाता है। आगे के चार मास तक सभी प्रकार के संस्कार एवं शुभकर्म वर्जित हो जाते हैं। आषाढ़ मास में शाक त्याग व्रत करना शुभकारी होता है।

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