अखिल भारतीय विद्वत् परिषद्

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माँ गंगा के पवित्र तट पर स्थित देश की धार्मिक राजधानी काशी नगरी में सं. २०५८ श्रावण शुक्ल पक्ष एकादशी तिथि, सोमवार (दिनांक ३० जुलाई २००१) को काशी विभूति परिषद् के रूप में वाराणसी में काशी विभूति सम्मिलन समारोह सम्पन्न हुआ। द्वितीय समारोह ५ अगस्त २००२ को काशी हिन्दू विश्वविद्यालय स्थित मालवीय भवन में सम्पन्न हुआ। तत्पश्चात् वि.सं. २०६० शकाब्द १९२५ की वैशाख शुक्ल बुद्ध पूर्णिमा तिथि सन् १६ मई २००३ के दिन अभिजित् मुहूत्र्त में एक विशाल विद्वद्गोष्ठी आहूत कर  निर्णय लिया गया कि संस्था का नाम बदल कर अखिल भारतीय विद्वत् परिषद् रखा जाय। फलत: अखिल भारतीय विद्वत् परिषद् की विधिवत् स्थापना सम्पन्न हुई।

२१ जून २०१७
बुधवार द्वादशी दिन ३:५८ तक ,भरणी दिन १०:३८ तक

महासचिव का सन्देश

डॉ. कामेश्वर उपाध्याय

pnaditjiभारतवर्ष विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्रात्मक प्राचीन राष्ट्र है। इस देश में श्रेष्ठ विद्वानों, चिन्तकों, विचारकों  की संख्या दस करोड़ से भी अधिक है। इसके बाद भी आज यह देश वैचारिक रूप से विघटित एवं संदेहग्रस्त है। अतः विद्वत्जनों को सभी प्रकार के आग्रहों से ऊपर उठकर राष्ट्र और जन के कल्याण हेतु एक दिशा में प्रयत्न करना चाहिए। किसी भी विषय पर एक मत को निर्धारित करने में वैज्ञानिक प्रक्रिया ही आधार बनती है। अतः सार्वभौमिक, प्रकृति नियंत्रित, राष्ट्र कल्याणकारी तथा सर्वतोमुख, सर्वग्राह्य नीति पर विचार करना विद्वत् समाज का महान् कर्तव्य है। इस कर्तव्य के पालन में यदि अपने स्वार्थ का त्याग भी करना पड़े तो इस पवित्र कार्य को करना चाहिए।

ज्ञान के सदृश त्रैलोक्य में कुछ भी पवित्र नहीं है- न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते। ज्ञान न केवल पवित्र है अपितु यह प्रकाशमय और सर्वकल्याणकारी है। अतः हमें दृढ़ता के साथ राष्ट्र हित में शांत एवं सुव्यवस्थित मन से निर्णय लेना होगा। राजनीति के माध्यम से सर्वकल्याणकारी नीतियाँ आज नहीं बनायी जा रही हैं। अपने प्रभुत्व एवं राजसत्ता के अनुकूल सिद्धान्तों का गठन किया जा रहा है। विदेशी नीतियों को बाह्य दबाव में राष्ट्र एवं जनविरोधी होने पर भी देश की जनता के ऊपर लादा जा रहा है।

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